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माँ पृथ्वी की अभिव्यक्ति: एक चेतावनी, एक संदेश

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माँ पृथ्वी

प्राकृतिक सौंदर्य की अभिव्यक्ति करती है पृथ्वी, मौन की याचना लेकर, स्वयं को परिभाषित करती है,अपने गुणों से सबके दिलों को परिपूर्ण करना चाहती हैं,सबके भीतर अपने महत्वपूर्ण गुण को गुरुत्वाकर्षण की शक्ति को भरना चाहती है,यह पृथ्वी हम सब का प्रतिनिधित्व करना चाहती है,पर मानव इस बात को नहीं समझ पाता,पृथ्वी के मौन की अभिव्यक्ति को न समझ पाने के कारण मानव अपराध करता चला जाता है, प्राकृतिक सौंदर्य को हानि पहुंचाता है |

जिस धरती पर सुबह उठकर अनायास हम अपने पैरों से उनको स्पर्श करते हैं,तो हमें क्षमा प्रार्थी होना चाहिए और उनके एक महत्वपूर्ण गुण को अपने भीतर आत्मसात करना चाहिए,जो हमें सशक्त बनाती हैं,पृथ्वी की दृढ़ता हमारे जीवन को आत्म बल देती है,आत्मनिर्भर बनाती है,पांच तत्वों में एक तत्व पृथ्वी तत्व,जो एक मानव के शरीर के अंदर जब वह अपने पहले तत्व पृथ्वी तत्व को समझ लेता है,जागृत कर लेता है,तो उसके भीतर पृथ्वी तत्व के साथ गणेश तत्व की शक्ति जागृत होकर उसे दैवीय शक्ति का आभास कराती है,पृथ्वी के अंदर जो गुरुत्वाकर्षण की शक्ति है हर एक चीज को अपने भीतर आत्मसात कर लेना,इसी पृथ्वी पर न जाने कितनी नदियों का प्रवाह है न जाने कितने छोटे और बड़े वृक्षों को संभालने की क्षमता है ।

विशाल से विशाल छोटे से छोटे वृक्ष को अपनी आगोश में भर लेती है,पूरे विश्व को अपने लहराते हुए आंचल में समेट लेती है जाने अनजाने में हुई न जाने कितनी गंदगी को हम अनायास पृथ्वी मां पर फेंक देते हैं और हम अपने भीतर सोचने की यह चेष्टा भी नहीं करते कि जिस धरती मां ने हमारी समस्त नकारात्मक शक्तियों को,गंदगी को अपने भीतर खींचकर हमें अपनी गोद में बिठाया है उसी धरती मां पर हम प्रहार करते जाते हैं,अपनी मानसिकता से अपने किए गए गलत कर्मों के अनुसार,जितना भी इस धरती पर हम गंदगी को फैलाते हैं,जितना भी हम धरती मां के प्रति उनका अनादर करते हैं,फिर भी पृथ्वी माँ शांत रहकर हमे देखती है।

उनके अंदर का सबसे बड़ा गुण मौन होना है । समस्त मानव की इस अवहेलना को झेलते हुए,अपमान को सहते हुए सब कुछ मौन होकर देखती रहती हैं,पर हर एक मानव को यह याद रखना चाहिए कि धरती मां है, और आकाश हमारे पिता है,ईश्वर की बनाई हुई इस सृष्टि में जब हम धरती मां को कष्ट पहुंचाते हैं,तब धरती मां का मौन टूटता है।जब हम अप्राकृतिक हो जाते हैं तो धरती मां का मौन टूट जाता है और प्रकृति के खिलाफ किए गए सारे कार्यों का लेखा-जोखा का पूर्ण हिसाब रखती है।

जाने कितनी प्राकृतिक आपदाएं आनी शुरू हो जाती है,इसे हमें इस तरह समझ लेना चाहिए कि जब बच्चा मां के द्वारा समझाई गई बताई गई बातों को नहीं समझ पाता तो मां उस पिता से शिकायत करके उस बच्चे को ठीक करना चाहती है। जब जब मानवीय चेतना नें प्रकृति के खिलाफ कार्य किया है,धरती मां को कष्ट पहुंचाया है धरती मां ने आकाश जैसे पिता से हम सब को समझाने का प्रयास किया है, हमें अप्राकृतिक नहीं होना है,हमें प्राकृतिक सौंदर्य को बचाकर रखना है, जिस तरह से प्रकृति हमारी मां है उसी तरह धरती हमारी मां है और हमारे भीतर जो वह अपने गुणों को भरना चाहती है,हमेशा सत्य बनाना चाहती हैं,हमारे अंदर के गुरुत्वाकर्षण की शक्ति को जागृत करना चाहती हैं, सभी के भीतर से निकली हुई उन समस्त तमाम दुख को,करुणा को,सबकी पीड़ा को आत्मसात करना सिखाती है।

पृथ्वी का एक बहुत सशक्त गुण है जिस चीज को वह अपने अंदर नही समेटती…..वह है आग,अग्नि कभी भी पृथ्वी में समाहित नही होती,वह अग्नि कभी भी धरती मां की तरफ नहीं जाती, अग्नि हमेशा धरती मां के ऊपर की तरफ प्रकट होती है,इससे हमें यह सीख लेनी चाहिए की धरती मां बड़े प्यार से हमारे अंदर की सारी नकारात्मक शक्तियों को बाधाओं को अपने भीतर खींचकर हमारे अंदर के प्रेम को ऊपर की तरफ ले जाना चाहती है,पूरे विश्व में प्रेम को फैलाना चाहती है।

तो आइए आज से हम सभी प्रतिज्ञा करे पृथ्वी माँ को सुरक्षित रखेगे।

 

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